Hindi Poem – तुमको सूचित हो…

पहले तो ये बात बता दूं कि इसी नाम से ऐसीही एक कविता मशहूर कवि डॉ कुमार विश्वास की भी है. आप चाहे तो इसी नाम को सर्च करके देख सकते है कि असल में वो रचना कैसी थी…ये उसी रचना की मेरे शब्दों में आवृत्ति है. फिरसे बता दूं कि ये कविता अलंकारिक रूप से कुमार विश्वास की कविता से प्रेरित जरूर है, पर ये मेरी रचना है.



कविता पेश है…

भ्रमर सा, मैंने प्यार किया था, तुमको सूचित हो…;

नफरत ने बनाया ड्रैगन मुझे, तुमको सूचित हो…!

के अब इतनी आग बन चुकी तेरे दिए ग़म की..;

तुम्हारी याद उसीमें जल जाती है तुमको सूचित हो…..!!

एक वक्त तुमपे जो मरता था, तुमको सूचित हो…;

वो आशिक ही आज मर चुका है तुमको सूचित हो…!

के तेरा नाम लेने पर भी जो आलम हँसी होता…;

वो नामोनिशान भी नही बचा अब, तुमको सूचित हो…!!

मोहोब्बत तेरी एक नाटिका थी, तुमको सूचित हो…;

जली खुशहाली की वो वाटिका थी, तुमको सूचित हो…!

इत्तेफाक नही था तेरा यूँ धोका दिए जाना,

परख अच्छे से लेता हूं लोगों को, तुमको सूचित हो…!

बढ़ रहा हूं अपनी जिंदगी में, तुमको सूचित हो…;

हारूँगा और जीतूंगा भी, हर इक बार तुमको सूचित हो….!

तूने भी जिंदगी में खो दिया एक बेशकीमती हीरा…;

मेरी क़ीमत मुझे मालूम, अब ये क्या तुमको सूचित हो…!!